Monday, August 30, 2010
Sunday, August 1, 2010
जीवन
दुःख -सुख रुपी
दो धाराओं का
होता है संगम !
संतुलन
हो जाता है जब
किसी एक के पक्ष में
जिंदगी के उस दौर में
आ जाता है असंतुलन !
पूर्णतः
सुख की चाह
होती है
अर्थहीन और निस्सार !
क्योकि ,तब
न होगा कोई
जिंदगी का लक्ष्य !
किसी
उपादान का आभाव ही
होता है
जिंदगी का लक्ष्य !
इसलिए
सुख के आभाव के भाव को
जिन्दा न सही तो
जीवाश्म के रूप में ही सही
बनाए रखिये !
क्योकि
स्वयं सुख
अपने अस्तित्व के लिए
याचक के रूप में
खड़ा है
दुःख के दरवाजे पर !!
देवेन्द्र कुमार
फतेहपुर,उप .
दुःख -सुख रुपी
दो धाराओं का
होता है संगम !
संतुलन
हो जाता है जब
किसी एक के पक्ष में
जिंदगी के उस दौर में
आ जाता है असंतुलन !
पूर्णतः
सुख की चाह
होती है
अर्थहीन और निस्सार !
क्योकि ,तब
न होगा कोई
जिंदगी का लक्ष्य !
किसी
उपादान का आभाव ही
होता है
जिंदगी का लक्ष्य !
इसलिए
सुख के आभाव के भाव को
जिन्दा न सही तो
जीवाश्म के रूप में ही सही
बनाए रखिये !
क्योकि
स्वयं सुख
अपने अस्तित्व के लिए
याचक के रूप में
खड़ा है
दुःख के दरवाजे पर !!
देवेन्द्र कुमार
फतेहपुर,उप .
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